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महाशिवरात्रि | why is shivratri celebrated| शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है ? | Maha Shivratri | Happy Maha Shivaratri |
महाशिवरात्रि | शिव पुराण | शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है ? | Maha Shivratri |Happy Maha Shivaratri |
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| Maha Shivaratri |
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| Maha Shivaratri wallpapers |
हर हर महादेव जय भोलेनाथ
यानि कान्यत्र लिंगानि, स्थावराणि चराणि च।
तेषु संक्रमते देवस्तस्यां, रात्रौ यतो हरः ।।
शिवरात्रिस्ततः प्रोकता, तेन सा हरिवल्लभाः।।
अर्थात
इस चल अचल सृष्टि में जहां कहीं भी शिवलिंग हैं चाहे वह छोटे हो या अत्यंत विशाल,उन सभी में भगवान शिव इस महाशिवरात्रि के दिन दिव्या रूप में समाहित हो जाते हैं और भक्तों की पूजा स्वीकार करते हैं।
भगवान श्री हरि विष्णु को भी महाशिवरात्रि का दिन अत्यंत प्रिया है।
भगवान भोलेनाथ की असीम अनुकंपा से वेद ऋषि श्री वेद व्यास जी द्वारा रचित शिव महापुराण में वर्णित दिव्या ज्ञान के माध्यम से आज की अपनी प्रस्तुति में हम हिंदू धर्म में मनाई जाने वाले एक पवित्र पर महाशिवरात्रि के बारे में जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं।
वैसे तो एक वर्ष में 12 शिवरात्रिया आती हैं, जो की प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती हैं। लेकिन फाल्गुन मास में पढ़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
वास्तव में हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि के पवन पर्व को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, कोई इस पर्व को भगवान शिव के जन्मदिवस के रूप में मानते हैं। तो कोई इस दिन को भगवान शिव के विषपान दिवस के रूप में मानते हैं।
तथा कोई इस दिन को भगवान शिव तथा माता पार्वती के विवाह के रूप में मानते हैं।
परंतु आज हम शिव महापुराण के विदेश्वर संहिता खंड में वर्णित ज्ञान के माध्यम से यह कथा सुना रहे हैं,
की जब शॉन कड़ी ऋषियों ने सूत जी से प्रश्न किया की ही महाभारत में भगवान शिव के दो रूप कौन-कौन से हैं, तथा उनकी उत्पति कैसे हुई।
कृपया हमें यह जानकारी देने की कृपा करें तब सूत जी ने कहा है मुनि श्रष्टो ब्रह्म रूप होने के कारण भगवान शिव निष्कर्ष अर्थात निराकार कहे गए हैं। तथा अनुप्रति अंगों सहित रूपबन होने के कारण उन्हें सकल अर्थात सरकार भी कहा गया है।
साकार और निराकार होने के कारण ही उन्हें ग्रहण कहा जाता है, यही कारण है की भगवान शिव की निराकार स्वरूप लिंग और सरकार स्वरूप मूर्ति की पूजा की जाती है।
भगवान शिव से भिन्न जो अन्याय दूसरे देवता हैं वे साक्षात ग्रहण नहीं है। इसलिए कहीं भी उनके लिए निराकार लिंग उपलब्ध नहीं उत्पत्ति हुई। और भगवान विष्णु के नाभि से कमल पर विराजमान ब्रह्मा उत्पन्न हुए। सृष्टि के निर्माण का दायित्व सोप तथा भगवान श्री हरि विष्णु को सृष्टि का पालनहार बनाया। और स्वयं ब्रह्मा जी अर्थात माथे के मध्य भाग से उत्पन्न होकर रुद्र रूप धारण किया। और सृष्टि के सड़क के रूप में स्थापित हुए ।
इस प्रकार उसे अनंत पर ब्रह्म से तीन देवों की उत्पत्ति हुई जिन्हें त्रिदेव कहां जाता है।
है मुनि श्रेष्ठो,
एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मदेव में कार्य शक्ति को लेकर विवाद हो गया। उसे विवाद से समस्त देवता भयभीत चिंतित और अत्यंत व्याकुल हो गए। फिर चिंता मग्न समस्त देवताओं ने दिव्या कैलाश शिखर पर जाकर इस विषय को लेकर चंद्रमौली भगवान चंद्रशेखर महादेव का स्तवन किया। तब देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान महादेव ने ब्रह्मा और भगवान विष्णु के विवाद स्थल के बीच में निराकार तथा आदि अंत रहित भीषण अग्नि स्तंभ के रूप में स्वयं का प्राकट्य किया। यह स्तंभ करोड़ सूर्य के तेज से भी अधिक ज्योतिर्मय था। और श्री विष्णु दोनों द्वारा उसे ज्योतिर्मय स्तंभ की ऊंचाई तथा गहराई को नापने की चेष्टा की गई तथा श्री विष्णु जी उत्तम के निचली छोड़ का पता लगाने के लिए गए परंतु दोनों ही उत्तम का अंत तथा आदि का पता नहीं कर पाए। और श्री विष्णु और ब्रह्मा भगवान शंकर को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके दाएं बाएं भाग में चुपचाप खड़े हो गए। फिर उन्होंने वहां साक्षात प्रकट पूजनीय महादेव को श्रेष्ठ आसन पर स्थापित करके पवित्र पुरुष वस्तु अर्थात दीर्घकाल तक रहने वाली वस्तुएं जैसे हर नूपुर केयर किरीट मणिमय कुंडल यज्ञोपवीत उत्तरीय वस्त्र पुष्पमाला रेशमी वस्त्र हर मुद्रा पुष्प तांबूल कपूर चंदन एवं अगरू का अनुलेप धूप दीप श्वेत छात्र व्यंजन ध्वज चैंबर तथा अन्याय दिव्या उपहार द्वारा जिनका वैभव वाणी और मैन की पहुंच से परे था, जो केवल पशुपति अर्थात परमात्मा के ही योग्य द और जिन्हें पशु अर्थात बुद्धिजीवी कदापि नहीं का सकते द उन महेश्वर का पूजन किया।
इस प्रकार सबसे पहले वहां ब्रह्माजी और विष्णु जी ने भगवान शंकर की पूजा की इससे प्रसन्न होकर भक्त वत्सल भगवान शिव ने अपने आरंभ और अंत रहित ज्योतिर्मय लिंग स्वरूप को अत्यंत छोटा किया और वहां नर्मभाव से खड़े हुए उन दोनों देवताओं से मुस्कुराकर कहा ही पुत्रों आज का दिन एक महान दिन है।
आज के दिन तुम्हारे द्वारा मेरे निराकार और सरकार रूप की जो पूजा हुई है, उससे मैं तुम दोनों पर अत्यंत प्रसन्न हूं।
इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान से महानतम होगा आज की यह तिथि महाशिवरात्रि के नाम से विख्यात होकर मेरे लिए परम प्रिया होगी। महाशिवरात्रि की स्थिति को मैं विशेष रूप से लिंग में समाहित रहूंगा और भक्तों की पूजा अर्चना स्वीकार करूंगा जो भी भक्तगण सच्चे भाव से इसका दर्शन स्पर्श और पूजन करेंगे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी
और बेसन धन वैभव से संपूर्ण होकर समस्त सांसारिक सुखों को भोगते हुए मोक्ष को प्राप्त होंगे ।
इस प्रकार तभी से महाशिवरात्रि का यह पवन पर मनाया जाता है। इस दिन सभी भक्तगण सच्चे मैन से भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं। शिवलिंग पर दूध जल चढ़ाते हैं। फल फूल बेलपत्र धतूरा इत्यादि तथा मिष्ठान अर्पित करते हैं
और चंदन का लेपन लगाकर धूप दीप प्रज्वलित करते हैं इससे भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पुरी करते हैं। उन्हें सुख सौभाग्य प्रदान करते हैं रोजगार एवं कारोबार में वृद्धि करते हैं
उनके जीवन में आने वाली समस्त परेशानियों को दूर करके सफलता के द्वार खोल देते हैं तो यह थी हिंदू धर्म में मनाई जाने वाले एक पवित्र पर महाशिवरात्रि के बारे में एक छोटी सी जानकारी साझा करते है और हम आशा करते हैं की आपको यह जानकारी अच्छी लगी होगी। अगर अच्छी लगी हो तो कमेंट करे। इसके लिए हम हृदय की अनंत गहराइयों से आपका कोटि-कोटि धन्यवाद करते हैं। एक बार फिर से आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिंद जय भारत।
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